जलमय जीवन या फिर जल से जीवन *
सृष्टि के प्रारंभ में यह पूरी पृथ्वी जल मय थी और सृष्टि के अंत में जल ही होगा। करोड़ों साल से इस धरती पर जलमय जीवन जीने की व्यवस्था कुदरती बनी हुई है।
आपने कभी पहाड़ी जंगलों में पानी के बहते हुऐ स्रोते कल कल बहते झरने देखे होंगे वे झरने किसी ग्लेशियर से नहीं बल्कि उस जंगल की सघन हरियाली के कारण ही पैदा हुए हैं ।
जबकि वहां किसी ने कोई पंप नहीं लगाया हुआ है धरती पर भी घनी सघन हरियाली और वनों के कारण ही धरती के भूगर्भ में मीठे जल के श्रोते बहते हैं ।
जल संकट से जूझती दुनिया के लोगों को यह बात पहले अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि धरती के 71% भाग में फैली जल राशि जिसको हम समुद्र कहते हैं , का 3% मीठा पानी ही धरती के हिस्से में मौजूद रहता है।
और इस 3 ℅ पानी का भी 2.4% मीठा पानी ग्लेशियर और उत्तरी ध्रुव पर हमेशा जमा रहता है केवल 0.6% पानी ही हम धरती वासियों के जीने के लिए धरती पर मौजूद रहता है।
जिसको 32 करोड़ सात लाख खरब गैलन मीठा पानी मापा गया है।
आश्चर्यजनक बात यह है कि इसकी मात्रा घटती बढ़ती नहीं है।
दुनियां में पानी का गणित ठीक जमीन की तरह है ।
जैसे हमारी पूरी दुनियाँ की यह जमीन घटती-बढ़ती नहीं है ,ठीक उसी तरह यह मीठा पानी भी घटता-बढ़ता नहीं है ।
और उसमें भी इस 3℅ मीठे जलराशि के 70% भाग का पूरी दुनिया में कृषि के लिऐ उपयोग होता है ।
यह तो बात हुई इस धरती पर मीठे जल के संतुलन चक्र की, इसके साथ ही बारिश का कुदरती चक्र इस संतुलन को दुनिया में बनाऐ रखता है, विचार करने की बात यह है कि जब पूरी दुनिया के पानी का गणित समझने बैठें तो यह मीठे पानी की मात्रा घटती बढ़ती नजर नहीं आती है।
तो फिर हम धरती वासियों के बीच हमारे रिहायशी क्षेत्रों मैं, खेत खलिहानों में यह मात्रा क्यों घट रही है, तो वजह साफ निकल कर आती है की कुदरती संरचनाओं से मानव की अति की छेड़छाड़ ही इसका मूल कारण है। हम इस मूल मंत्र को ही भूल गये,
आओ चलें कुदरत के संग,
तो कुदरत करें ना हमको तंग ।
हमने कुदरत के संग कदम मिलाकर चलना ही छोड़ दिया है आज हमें जान से ज्यादा माल से प्यार हो गया है ,विकास की अंधी दौड़ में हम इस दुनियां को महामरण की ओर धकेले जा रहे हैं ,करोड़ों साल पहले भी, और आज भी कुदरत के किसी कार्य में कोई अंतर नहीं आया है ,सूर्य अपने समय पर निकलता है चांद अपने समय, मौसम अपने समय पर बदलते हैं ,अगर कुछ बदल रहा है तो वह केवल और केवल मनुष्य के द्वारा उल्टे काम करने की वजहा से।
आज भी अनेकों जगह हुनरमंद मानव समाज ने अपनी समझ जगाकर कुदरत से तालमेल कर बैठा कर अपने जीवन को खुशहाल और अपने आसपास के समाज को खुशहाल किया है वहां की प्रकृति को सामाजिक सहयोग से पूर्व की भांति पुनः उसके स्वरूप में लाकर दुनियां को नसीहत दी है ।
जिसमें हम देवास जिला मध्य प्रदेश जहां लातूर से भी पहले पानी की रेलें पहुंचाई गयीं, आज वहां के लोगों ने अपने क्षेत्र को पानी के मामले में स्वालंबी बना कर पुनः खड़ा किया है, राजस्थान के अलवर थानागाजी के गांव करौली में सपोटरा के डांग जहाँ लोग पानी की कमी से अपने अपने घर छोड़ कर जा चुके थे , आज वही लोग अपने जलसंचयन की कला के फल स्वरूप धान की खेती कर रहे हें।
दूधातोली उफरैखाल के 200 से जायदा गांव जो पौड़ी गढ़वाल में है वहां के पहाड़ी जंगल जो कभी वीरान हो चुके थे स्थानीय निवासियों की समझ और कर्मफल के फलस्वरूप वहां के समाज ने आपसी सहयोग से पहाड़ों पर हजारों ताल खाल बना कर ऐसे सघन जंगल खड़े कर दिऐ कि आप चहा कर भी उनमे घुस नही सकते न उनमें कभी आग लगी, परिणाम स्वरूप वहाँ के गाड गाँव से निकलने वाली नदी जो सूखारोला कहलाती थी जो केवल बारिश के दिनो मे ही बहती थी का सघन वनीकरण क परिणामे फलस्वरूप पूरे बर्ष भर बहने लगी तब इन लोगों ने सूखारोला नदी का नाम बदल कर गाडगंगा रख दिया ।
जयपुर की तहसील दूदू का गांव लापोड़िया गांव और उससे जुडे करीबी़े 58 गांवों का पानी जहां कभी 500 फुट से लगा कर 600 ,700 ,800 फुट तक गायब था आज उनके कर्म योग से इन 58 गांव के 103 कुओं में आज जल स्तर 12 , 14 फुट पर मौजूद है।
लापोड़िया उसके आस-पास के गांव आज देश दुनिया को पानी की मिसालें दे रहे हैं, हमें कुदरत के साथ तालमेल बिठाने नसीहत दे रहे हैं । इस लेख में दिए गए उदहारणों की कई क्षेत्रों मैं खुद हो कर आया हूं। और इतना ही समझा कि,
हे मानव तू भागीरथ बन, तो सब हो जाएगा चंगा,
आकाश बूंद से ही संचालित होती ,दुनियां की हर गंगा।
पर नहीं हमें तो अपना पानी बहाना है और वह भी पूरी लापरवाही के साथ और दूसरों के का दूसरों के हिस्से का पानी चुराना है आज दुनिया में गहराये जल संकट का कारण अपने हिस्से के जल का संग्रह ना करना और दूसरे के हिस्से का जल छीन्ना है ।
ना कि बारिश की कमी भारत के आजादी के वक्त भारत में 24 लाख झील तालाबों की उपेक्षा और बर्बादी , मैदानी जंगलों व पहाड़ी जंगलों का सफाया कर हर जगह आबादी बसा देने की नीति ने दुनिया को और हमारे
देश को जलमय जीवन की जगह जल से जीने का उल्टा पाठ पढ़ा कर तबाही का यह तोहफा दिया है।
आपने कभी पहाड़ी जंगलों में पानी के बहते हुऐ स्रोते कल कल बहते झरने देखे होंगे वे झरने किसी ग्लेशियर से नहीं बल्कि उस जंगल की सघन हरियाली के कारण ही पैदा हुए हैं ।
जबकि वहां किसी ने कोई पंप नहीं लगाया हुआ है धरती पर भी घनी सघन हरियाली और वनों के कारण ही धरती के भूगर्भ में मीठे जल के श्रोते बहते हैं ।
जल संकट से जूझती दुनिया के लोगों को यह बात पहले अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि धरती के 71% भाग में फैली जल राशि जिसको हम समुद्र कहते हैं , का 3% मीठा पानी ही धरती के हिस्से में मौजूद रहता है।
और इस 3 ℅ पानी का भी 2.4% मीठा पानी ग्लेशियर और उत्तरी ध्रुव पर हमेशा जमा रहता है केवल 0.6% पानी ही हम धरती वासियों के जीने के लिए धरती पर मौजूद रहता है।
जिसको 32 करोड़ सात लाख खरब गैलन मीठा पानी मापा गया है।
आश्चर्यजनक बात यह है कि इसकी मात्रा घटती बढ़ती नहीं है।
दुनियां में पानी का गणित ठीक जमीन की तरह है ।
जैसे हमारी पूरी दुनियाँ की यह जमीन घटती-बढ़ती नहीं है ,ठीक उसी तरह यह मीठा पानी भी घटता-बढ़ता नहीं है ।
और उसमें भी इस 3℅ मीठे जलराशि के 70% भाग का पूरी दुनिया में कृषि के लिऐ उपयोग होता है ।
यह तो बात हुई इस धरती पर मीठे जल के संतुलन चक्र की, इसके साथ ही बारिश का कुदरती चक्र इस संतुलन को दुनिया में बनाऐ रखता है, विचार करने की बात यह है कि जब पूरी दुनिया के पानी का गणित समझने बैठें तो यह मीठे पानी की मात्रा घटती बढ़ती नजर नहीं आती है।
तो फिर हम धरती वासियों के बीच हमारे रिहायशी क्षेत्रों मैं, खेत खलिहानों में यह मात्रा क्यों घट रही है, तो वजह साफ निकल कर आती है की कुदरती संरचनाओं से मानव की अति की छेड़छाड़ ही इसका मूल कारण है। हम इस मूल मंत्र को ही भूल गये,
आओ चलें कुदरत के संग,
तो कुदरत करें ना हमको तंग ।
हमने कुदरत के संग कदम मिलाकर चलना ही छोड़ दिया है आज हमें जान से ज्यादा माल से प्यार हो गया है ,विकास की अंधी दौड़ में हम इस दुनियां को महामरण की ओर धकेले जा रहे हैं ,करोड़ों साल पहले भी, और आज भी कुदरत के किसी कार्य में कोई अंतर नहीं आया है ,सूर्य अपने समय पर निकलता है चांद अपने समय, मौसम अपने समय पर बदलते हैं ,अगर कुछ बदल रहा है तो वह केवल और केवल मनुष्य के द्वारा उल्टे काम करने की वजहा से।
आज भी अनेकों जगह हुनरमंद मानव समाज ने अपनी समझ जगाकर कुदरत से तालमेल कर बैठा कर अपने जीवन को खुशहाल और अपने आसपास के समाज को खुशहाल किया है वहां की प्रकृति को सामाजिक सहयोग से पूर्व की भांति पुनः उसके स्वरूप में लाकर दुनियां को नसीहत दी है ।
जिसमें हम देवास जिला मध्य प्रदेश जहां लातूर से भी पहले पानी की रेलें पहुंचाई गयीं, आज वहां के लोगों ने अपने क्षेत्र को पानी के मामले में स्वालंबी बना कर पुनः खड़ा किया है, राजस्थान के अलवर थानागाजी के गांव करौली में सपोटरा के डांग जहाँ लोग पानी की कमी से अपने अपने घर छोड़ कर जा चुके थे , आज वही लोग अपने जलसंचयन की कला के फल स्वरूप धान की खेती कर रहे हें।
दूधातोली उफरैखाल के 200 से जायदा गांव जो पौड़ी गढ़वाल में है वहां के पहाड़ी जंगल जो कभी वीरान हो चुके थे स्थानीय निवासियों की समझ और कर्मफल के फलस्वरूप वहां के समाज ने आपसी सहयोग से पहाड़ों पर हजारों ताल खाल बना कर ऐसे सघन जंगल खड़े कर दिऐ कि आप चहा कर भी उनमे घुस नही सकते न उनमें कभी आग लगी, परिणाम स्वरूप वहाँ के गाड गाँव से निकलने वाली नदी जो सूखारोला कहलाती थी जो केवल बारिश के दिनो मे ही बहती थी का सघन वनीकरण क परिणामे फलस्वरूप पूरे बर्ष भर बहने लगी तब इन लोगों ने सूखारोला नदी का नाम बदल कर गाडगंगा रख दिया ।
जयपुर की तहसील दूदू का गांव लापोड़िया गांव और उससे जुडे करीबी़े 58 गांवों का पानी जहां कभी 500 फुट से लगा कर 600 ,700 ,800 फुट तक गायब था आज उनके कर्म योग से इन 58 गांव के 103 कुओं में आज जल स्तर 12 , 14 फुट पर मौजूद है।
लापोड़िया उसके आस-पास के गांव आज देश दुनिया को पानी की मिसालें दे रहे हैं, हमें कुदरत के साथ तालमेल बिठाने नसीहत दे रहे हैं । इस लेख में दिए गए उदहारणों की कई क्षेत्रों मैं खुद हो कर आया हूं। और इतना ही समझा कि,
हे मानव तू भागीरथ बन, तो सब हो जाएगा चंगा,
आकाश बूंद से ही संचालित होती ,दुनियां की हर गंगा।
पर नहीं हमें तो अपना पानी बहाना है और वह भी पूरी लापरवाही के साथ और दूसरों के का दूसरों के हिस्से का पानी चुराना है आज दुनिया में गहराये जल संकट का कारण अपने हिस्से के जल का संग्रह ना करना और दूसरे के हिस्से का जल छीन्ना है ।
ना कि बारिश की कमी भारत के आजादी के वक्त भारत में 24 लाख झील तालाबों की उपेक्षा और बर्बादी , मैदानी जंगलों व पहाड़ी जंगलों का सफाया कर हर जगह आबादी बसा देने की नीति ने दुनिया को और हमारे
देश को जलमय जीवन की जगह जल से जीने का उल्टा पाठ पढ़ा कर तबाही का यह तोहफा दिया है।
जलमय जीवन का चक्र तोड़कर
जल से जीवन का आरंभ किया
कुदरती चक्रों को तोड़ तोड़ कर
विकास का तुमने दंभ किया
प्रकृति का फल जीव का बल था
जीव का मल प्रकृति का बल
यह चक्र ही ध्वस्त कर डाला है
यह प्रदूषण का जिन तुमने
अपनी करनी से पाला है
आओ चलें कुदरत के संग
तो कुदरत करें न हम को तंग
यह नारा ही हम भूल गए
कृत्रिम संसाधन ही हमारे
अब जीवन में झूल गये
मछली की कांटे की मानिंद
हमारे कर्म गले में अटक गए
अब भी हमारी समझ नहीं जागी
हम कदम कदम पर भटक गए
दूर दृष्टि तो गोल हुई पर
तत्काल फायदा याद रहा
जिसको तुमने विकास कहा
वही असल विनाश रहा।।
जल से जीवन का आरंभ किया
कुदरती चक्रों को तोड़ तोड़ कर
विकास का तुमने दंभ किया
प्रकृति का फल जीव का बल था
जीव का मल प्रकृति का बल
यह चक्र ही ध्वस्त कर डाला है
यह प्रदूषण का जिन तुमने
अपनी करनी से पाला है
आओ चलें कुदरत के संग
तो कुदरत करें न हम को तंग
यह नारा ही हम भूल गए
कृत्रिम संसाधन ही हमारे
अब जीवन में झूल गये
मछली की कांटे की मानिंद
हमारे कर्म गले में अटक गए
अब भी हमारी समझ नहीं जागी
हम कदम कदम पर भटक गए
दूर दृष्टि तो गोल हुई पर
तत्काल फायदा याद रहा
जिसको तुमने विकास कहा
वही असल विनाश रहा।।
हम लोग इस धरा पर जहां भी रहते हैं लगभग किसी ना किसी नदी या जल धारा के जल अधिग्रहण क्षेत्र में ही रहते हैं जिसे अंग्रेजी में कैचमेंट क्षेत्र कहते हैं मतलब वहां से हमारे उपयोग में लाया गया पानी या बारिश का पानी दोनों ही आज की तरहा सीधे हमारे दुबारा बनाए सरकारी नालों से कभी नदी या जलधाराओं की तरफ नहीं दौड़ता था, जिस कारण न नदी प्रदूषित होती थी न तुरंत उसमें बाढ़ आती थी , पहले यह जल नदी के कैचमेंट क्षेत्र में बने झील तालाब पोखर व सोखतों में जाता था ।
प्राचीन भारत में तो यही तरीका अपनाया जाता था, उस वक्त हमारे आगरा में ही लगभग 500 तालाबों का उल्लेख मिलता है, संपूर्ण भारत लगभग 24 लाख झील तालाबों का उल्लेख मिलता है ।
जो भूगर्भ के जल के स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ वाटर ट्रीटमेंट का भी कुदरती कार्य करते हुऐ हमारी धरती की नमी बरक़रार रख धरती पर कुदरती हरियाली बरक़रार रख , छोटी छोटी जल धाराओं वह नदीयों को भी निर्मल व अविरल जल देकर सदानीरा बनाए रखते थे। आज नदियों की अविरलता की सबसे बड़ी बाधा उन बांधों से निकाली गई नहरें हें जो नदियों को अति का निचोड़ कर उनका दम निकाल रही हें ।
और नदीयों के दूषित होने की सबसे बड़ी वजह सरकारी धन से नदियों तक नालों का निर्माण है जो नदियों का बेड़ार्गक कर रहा है।
और नदियों का पेट भरने वाले देश के हजारों लाखों एकड़ जंगल की भूमि के साथ साथ साथ देश भर के 24 लाख झील तालाबों की भूमि को तो लालची लोभी लोगों ने पाक पाट कर उनकी जमीनों पर कब्जे कर लिए , और इस तरह बिना लागात में ही समाज को दूषित जल का कुदरती निर्मलीकरण कर अविरल जल देने वाली इस सुविधा का , जो जलभराव व बाढ़ की विभीषिका को अपने अपने क्षेत्रों में संभाले रहती थीं का, तथा जल संकट के दिनों में भी सुविधा देने वाली इन इकाइयों का ही लोभी जनों ने सत्यानाश कर दिया।
आजकल हमने हर कार्य को सरकारी धन और मशीनों से करने का जो दंभ पाल रक्खा है ,उसीका परिणाम
*ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया*
हो रहा है ,आज मेरे आगरा में ही 4 अरब रुपए की लागत से 10 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं, संभव इसी तरह के सारे देश में लगे हैं और लगने जा रहे हैं।
जिनका कोई भी भरोसा नहीं है कि वह नदी साफ रखने में कितने सफल होंगे क्योंकि अभी तक जो भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे सब सफेद हाथी ही सिद्ध हुए हैं ।
अभी जबकि हमारे झील तालाब पोखर समाज की कसौटी पर हमेशा खरे उतरे हैं ।
साथ ही मुफ्त में बाढ़ और सूखे के समाधान के साथ साथ दूषितजल शोधन का कुदरती कार्य करने का भी लाजवाब हिस्सा रहे हैं । मैरी इस बात की सच्चाई को गहराई से जानने चाहें तो गुगल पर ( एक निर्मल कथा ) लिख कर सर्च करें और पढ़ें , या कोलकाता जा कर खुद आंखों देख कर आऐं की कैसे यह शहर अपने गंदे नाले हमारे देश की राजधानी दिल्ली , व नगर मथुरा आगरा, कानपुर की तरहा यमुना गंगा में नहीं गिरता है।
आज भी जिन शहरों कस्बों में नदियां नहीं हैं वहां का दूषितजल आज भी सोखतों पोखरों तालाबों में ही जाता है।
जो वहां के निवासियों को भूजल से पुनः रिस रिस कर भुमिगत होता हुआ निर्मल होकर प्राप्त होता रहता है । हमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने से ज्यादा केमिकल ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की जरूरत है जो हमारे कुदरती चक्र की मूल बाधा हैं, जिसका उपचार भी कैमिकल उत्सृजन करने वाले कारखानों उद्योग के मुहाने पर ही संभव होगा।
साथ ही मल को जल को अलग रखने की जरूरत है जब कुदरत ने ही हम सभी क शरीेर में जल मल के रास्ते अलग-अलग बनाए हुए हैं तो ,हम क्यों जल मल को पहले एक कर फिर मशीनों से उसे शुद्ध करने की अंधी सुरंग में भटक गए हैं। इसके साथ-साथ यह भी समझने की बात है , कि जब हमारे शहरों में क्षेत्रों में दंगा होता है तो पुलिस द्वारा धारा 144 लगा कर दूषित मानसिकता के लोगों को एक साथ प्रशासन द्वारा इकट्ठा नहीं होने दिया जाता है,ताकी लोग एक जगह इकट्ठा कोई बबाल न कर दें।
मतलब यह कि हमारे पुरखों ने बुरी खराब चीज को कभी एक जगहा इकट्ठा ही नहीं होने दिया, मगर हम आज शहर भर की गंदगी को या दूषित जल को
एक जगह इकट्ठा कर कैसे उसका धन के दंभ में समाधान कर सकते हैं ।
समाधान है *तैरा तुझको अर्पण* के मंत्र में , जो कुदरत का था वह तो कुदरत वापस लेती ही है ,मगर कारखाने का माल अंत में कारखानों को ही वापस लेना होगा।
और नारा देने होगा ।
जो वापस नहीं कारखाने में,
वो माल न चलेगा जमाने में।
अतःहम जो भी करें पहले यह अच्छी तरह से जांच परख लें कि इस कार्य का अंत क्या होगा।
यह तो इस भारत भूमि के ऋषियों के शब्द हैं भला क्या ?
*अंत भला तो सब भला*
प्राचीन भारत में तो यही तरीका अपनाया जाता था, उस वक्त हमारे आगरा में ही लगभग 500 तालाबों का उल्लेख मिलता है, संपूर्ण भारत लगभग 24 लाख झील तालाबों का उल्लेख मिलता है ।
जो भूगर्भ के जल के स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ वाटर ट्रीटमेंट का भी कुदरती कार्य करते हुऐ हमारी धरती की नमी बरक़रार रख धरती पर कुदरती हरियाली बरक़रार रख , छोटी छोटी जल धाराओं वह नदीयों को भी निर्मल व अविरल जल देकर सदानीरा बनाए रखते थे। आज नदियों की अविरलता की सबसे बड़ी बाधा उन बांधों से निकाली गई नहरें हें जो नदियों को अति का निचोड़ कर उनका दम निकाल रही हें ।
और नदीयों के दूषित होने की सबसे बड़ी वजह सरकारी धन से नदियों तक नालों का निर्माण है जो नदियों का बेड़ार्गक कर रहा है।
और नदियों का पेट भरने वाले देश के हजारों लाखों एकड़ जंगल की भूमि के साथ साथ साथ देश भर के 24 लाख झील तालाबों की भूमि को तो लालची लोभी लोगों ने पाक पाट कर उनकी जमीनों पर कब्जे कर लिए , और इस तरह बिना लागात में ही समाज को दूषित जल का कुदरती निर्मलीकरण कर अविरल जल देने वाली इस सुविधा का , जो जलभराव व बाढ़ की विभीषिका को अपने अपने क्षेत्रों में संभाले रहती थीं का, तथा जल संकट के दिनों में भी सुविधा देने वाली इन इकाइयों का ही लोभी जनों ने सत्यानाश कर दिया।
आजकल हमने हर कार्य को सरकारी धन और मशीनों से करने का जो दंभ पाल रक्खा है ,उसीका परिणाम
*ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया*
हो रहा है ,आज मेरे आगरा में ही 4 अरब रुपए की लागत से 10 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं, संभव इसी तरह के सारे देश में लगे हैं और लगने जा रहे हैं।
जिनका कोई भी भरोसा नहीं है कि वह नदी साफ रखने में कितने सफल होंगे क्योंकि अभी तक जो भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे सब सफेद हाथी ही सिद्ध हुए हैं ।
अभी जबकि हमारे झील तालाब पोखर समाज की कसौटी पर हमेशा खरे उतरे हैं ।
साथ ही मुफ्त में बाढ़ और सूखे के समाधान के साथ साथ दूषितजल शोधन का कुदरती कार्य करने का भी लाजवाब हिस्सा रहे हैं । मैरी इस बात की सच्चाई को गहराई से जानने चाहें तो गुगल पर ( एक निर्मल कथा ) लिख कर सर्च करें और पढ़ें , या कोलकाता जा कर खुद आंखों देख कर आऐं की कैसे यह शहर अपने गंदे नाले हमारे देश की राजधानी दिल्ली , व नगर मथुरा आगरा, कानपुर की तरहा यमुना गंगा में नहीं गिरता है।
आज भी जिन शहरों कस्बों में नदियां नहीं हैं वहां का दूषितजल आज भी सोखतों पोखरों तालाबों में ही जाता है।
जो वहां के निवासियों को भूजल से पुनः रिस रिस कर भुमिगत होता हुआ निर्मल होकर प्राप्त होता रहता है । हमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने से ज्यादा केमिकल ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की जरूरत है जो हमारे कुदरती चक्र की मूल बाधा हैं, जिसका उपचार भी कैमिकल उत्सृजन करने वाले कारखानों उद्योग के मुहाने पर ही संभव होगा।
साथ ही मल को जल को अलग रखने की जरूरत है जब कुदरत ने ही हम सभी क शरीेर में जल मल के रास्ते अलग-अलग बनाए हुए हैं तो ,हम क्यों जल मल को पहले एक कर फिर मशीनों से उसे शुद्ध करने की अंधी सुरंग में भटक गए हैं। इसके साथ-साथ यह भी समझने की बात है , कि जब हमारे शहरों में क्षेत्रों में दंगा होता है तो पुलिस द्वारा धारा 144 लगा कर दूषित मानसिकता के लोगों को एक साथ प्रशासन द्वारा इकट्ठा नहीं होने दिया जाता है,ताकी लोग एक जगह इकट्ठा कोई बबाल न कर दें।
मतलब यह कि हमारे पुरखों ने बुरी खराब चीज को कभी एक जगहा इकट्ठा ही नहीं होने दिया, मगर हम आज शहर भर की गंदगी को या दूषित जल को
एक जगह इकट्ठा कर कैसे उसका धन के दंभ में समाधान कर सकते हैं ।
समाधान है *तैरा तुझको अर्पण* के मंत्र में , जो कुदरत का था वह तो कुदरत वापस लेती ही है ,मगर कारखाने का माल अंत में कारखानों को ही वापस लेना होगा।
और नारा देने होगा ।
जो वापस नहीं कारखाने में,
वो माल न चलेगा जमाने में।
अतःहम जो भी करें पहले यह अच्छी तरह से जांच परख लें कि इस कार्य का अंत क्या होगा।
यह तो इस भारत भूमि के ऋषियों के शब्द हैं भला क्या ?
*अंत भला तो सब भला*
मोहन कुमार सिंह
35/472 नौबस्ता लोहामंडी
आगरा पिन कोड
282002
35/472 नौबस्ता लोहामंडी
आगरा पिन कोड
282002
No comments:
Post a Comment