हमारे जंगलों मैं बिलायती बबूल
साजिश या भूल
महोदय एक तरफ दुनियाँ समाज सरकार कि तरफ से परियावर्ण बचाओ पेड़ लगाओ का ऐलान, नारे ,जुमलों , से परियावर्ण के प्रति देश दुनियाँ के लोग तो जागरुक हुए हें।
पर हमारे आगरा जनपद और आसपास के जिलों के सरकारी वनों मैं वन विभाग दुआरा बिलायती बबूल लगाना और सरकारी खर्चे पर उसकी परवरिश करना
(कोई साजिश है या भूल) यह समझना बहुत जरूरी है, आपने यह कहावत तो सुनी होगी।
*बोये पेड़ बबूल के आम कहाँ से खाऐं*
हमारे वन विभाग पर सटीक बैठती है
हमारे आगरा क्षेत्र के ही सरकारी वनों मैं खड़े हो कर आप जिधर नजर डालोगे ,आपको अधिकांश यह बिलायती बबलू ही बबूल दिखाई देगा परिणाम स्वरूप
जब हमारे जंगलों मैं देशी पेड़ पौधे ,देशी झाडियाँ व घास ही नहीं होंगी ,तो इन जंगलों मैं परिंदों की जानवरों की भूमी गत जीवों की जैव विविधता भी नहीं होगी ,जब जैव विविधता नहीं होगी तो उस जंगल मैं पशु पक्षियों दुआरा होने वाला बीजारोपण भी नही होगा,क्योंकि चिड़ियाँ जब देशी पेड़ों के फल खाखा कर जब बीट करती हैं और देशी पेड़ों व झाड़ियों मैं घोंसले बनाना पसंद करती हैं ,और वहीं पेड़ों पर झुंड के झुंड बैठ ती हें और बीट करती हैं ,तब उनकी बीट मैं छुपे हुऐ बीज जो चिड़िया के पेट मैं रहने के कारण जैविक रासायनिक क्रिया से गुजर कर बीट के साथ बहार आते हें ,तब वह पौधा बनने की पूरी क्षमता रखते हैं। तब उन बीटों के अंदर छिपे बीजों से जंगल मैं 6000 बर्ष की उम्र रखने वाले बरगद,700 बर्ष उम्र के पीपल , 500 बर्ष उम्र के गूलर जैसे अनगिनत पेड़ पौधे अपने आप पैदा होते रहते हें साथ ही नाना प्रकार की वनस्पति झाड़ियाँ घास आदि पैदा हो कर इन जंगलों मैं कुदरती ही इतने सघन घने वन खड़े कर देती है कि आम आदमी तो अचानक उसमें घुस भी नहीं सकता है । तब यह अति घने सघन वन हमारी धरती का भूजल स्तर बढाने के साथ साथ जल की गुणवत्ता मैं भी सुधार करते हैं।
मगर हमारे यहाँ के इन जंगलों मैं इस बिलायती कीकर बबूलों ने तो कुदरती वन के स्वरूप का ही सत्यानाश मारा हुआ है शहरों मैं पेड़ लगाने को जगहा मिलना मुश्किल है और सरकारी वनों मैं बिलायती बबूल का राज।
जबकि हमारे देश मैं वन मंत्रालय से लेकर वन विभाग का इतना बड़ा तामझाम है, साथ साथ करोड़ों रुपये का बजट भी होता है।
इस सब के बाबजूद यहाँ न तो ढंग के वन नजर आते हैं न इन वनों से ढंग की बारिश की उम्मीद की जा सकती है न अच्छे परियावर्ण वातावरण की उम्मीद की जा सकती है। साथ ही आगरा के सरकारी जंगलों में देशी पैड़ी पौधों के सघन वनीकरण के अभाव में ,जहां वायु प्रदूषण अपने मानकों से पार जा नागरिकों के स्वास्थ्य का बेड़ा गर्ग कर रहा है , वहीं विश्व विख्यात धरोहर ताज महल भी अपना रंग बदल रहा जिसके कारण हमारे देश की छवि दुनियां में धूमिल हो रही है।
मैं अपनी बात आपके सामने रखने के साथ साथ दो विद्धानों के लेख भी संगलन कर रहा हूँ जो बिलायती बबूल जिसका वैग्यानिक नाम (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) है, की सच्चाई को और स्पष्ट ढंग से समाज के सामने रखते हैं ।
और यहाँ के प्राकृतिक प्रेमीयों सेआशा करता हूँ कि इस सच से आवगत हो कर प्रकृति से सच्चा प्रेम करने वाले शासन प्रशासन मैं बैठे सच्चे लोग व समाज के परियावर्ण प्रेमी , इस नामुराद बिलायती बबूल का धीरे धीरे जड़ से खात्मा करा कर भारत के देशी पेड़ पौधे झाड़ियाँ घास वनस्पतियों के सघन वन खड़े करने में अपने अपने तन मन धन बिचारों की शक्ति से सहयोगी बनेगे,और इस बिलायती बबलू के खिलाफ आवाज बुलंद कर हमारे सरकारी वनों को प्राचीन भारत की तरहा सघन घने देशी पेड़ पौधों हरियाली से आच्छादित कराऐंगे।
मोहन कुमार
35/472 नौबस्ता लोहामंडी
आगरा- 9411922603 मो.न.
साजिश या भूल
महोदय एक तरफ दुनियाँ समाज सरकार कि तरफ से परियावर्ण बचाओ पेड़ लगाओ का ऐलान, नारे ,जुमलों , से परियावर्ण के प्रति देश दुनियाँ के लोग तो जागरुक हुए हें।
पर हमारे आगरा जनपद और आसपास के जिलों के सरकारी वनों मैं वन विभाग दुआरा बिलायती बबूल लगाना और सरकारी खर्चे पर उसकी परवरिश करना
(कोई साजिश है या भूल) यह समझना बहुत जरूरी है, आपने यह कहावत तो सुनी होगी।
*बोये पेड़ बबूल के आम कहाँ से खाऐं*
हमारे वन विभाग पर सटीक बैठती है
हमारे आगरा क्षेत्र के ही सरकारी वनों मैं खड़े हो कर आप जिधर नजर डालोगे ,आपको अधिकांश यह बिलायती बबलू ही बबूल दिखाई देगा परिणाम स्वरूप
जब हमारे जंगलों मैं देशी पेड़ पौधे ,देशी झाडियाँ व घास ही नहीं होंगी ,तो इन जंगलों मैं परिंदों की जानवरों की भूमी गत जीवों की जैव विविधता भी नहीं होगी ,जब जैव विविधता नहीं होगी तो उस जंगल मैं पशु पक्षियों दुआरा होने वाला बीजारोपण भी नही होगा,क्योंकि चिड़ियाँ जब देशी पेड़ों के फल खाखा कर जब बीट करती हैं और देशी पेड़ों व झाड़ियों मैं घोंसले बनाना पसंद करती हैं ,और वहीं पेड़ों पर झुंड के झुंड बैठ ती हें और बीट करती हैं ,तब उनकी बीट मैं छुपे हुऐ बीज जो चिड़िया के पेट मैं रहने के कारण जैविक रासायनिक क्रिया से गुजर कर बीट के साथ बहार आते हें ,तब वह पौधा बनने की पूरी क्षमता रखते हैं। तब उन बीटों के अंदर छिपे बीजों से जंगल मैं 6000 बर्ष की उम्र रखने वाले बरगद,700 बर्ष उम्र के पीपल , 500 बर्ष उम्र के गूलर जैसे अनगिनत पेड़ पौधे अपने आप पैदा होते रहते हें साथ ही नाना प्रकार की वनस्पति झाड़ियाँ घास आदि पैदा हो कर इन जंगलों मैं कुदरती ही इतने सघन घने वन खड़े कर देती है कि आम आदमी तो अचानक उसमें घुस भी नहीं सकता है । तब यह अति घने सघन वन हमारी धरती का भूजल स्तर बढाने के साथ साथ जल की गुणवत्ता मैं भी सुधार करते हैं।
मगर हमारे यहाँ के इन जंगलों मैं इस बिलायती कीकर बबूलों ने तो कुदरती वन के स्वरूप का ही सत्यानाश मारा हुआ है शहरों मैं पेड़ लगाने को जगहा मिलना मुश्किल है और सरकारी वनों मैं बिलायती बबूल का राज।
जबकि हमारे देश मैं वन मंत्रालय से लेकर वन विभाग का इतना बड़ा तामझाम है, साथ साथ करोड़ों रुपये का बजट भी होता है।
इस सब के बाबजूद यहाँ न तो ढंग के वन नजर आते हैं न इन वनों से ढंग की बारिश की उम्मीद की जा सकती है न अच्छे परियावर्ण वातावरण की उम्मीद की जा सकती है। साथ ही आगरा के सरकारी जंगलों में देशी पैड़ी पौधों के सघन वनीकरण के अभाव में ,जहां वायु प्रदूषण अपने मानकों से पार जा नागरिकों के स्वास्थ्य का बेड़ा गर्ग कर रहा है , वहीं विश्व विख्यात धरोहर ताज महल भी अपना रंग बदल रहा जिसके कारण हमारे देश की छवि दुनियां में धूमिल हो रही है।
मैं अपनी बात आपके सामने रखने के साथ साथ दो विद्धानों के लेख भी संगलन कर रहा हूँ जो बिलायती बबूल जिसका वैग्यानिक नाम (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) है, की सच्चाई को और स्पष्ट ढंग से समाज के सामने रखते हैं ।
और यहाँ के प्राकृतिक प्रेमीयों सेआशा करता हूँ कि इस सच से आवगत हो कर प्रकृति से सच्चा प्रेम करने वाले शासन प्रशासन मैं बैठे सच्चे लोग व समाज के परियावर्ण प्रेमी , इस नामुराद बिलायती बबूल का धीरे धीरे जड़ से खात्मा करा कर भारत के देशी पेड़ पौधे झाड़ियाँ घास वनस्पतियों के सघन वन खड़े करने में अपने अपने तन मन धन बिचारों की शक्ति से सहयोगी बनेगे,और इस बिलायती बबलू के खिलाफ आवाज बुलंद कर हमारे सरकारी वनों को प्राचीन भारत की तरहा सघन घने देशी पेड़ पौधों हरियाली से आच्छादित कराऐंगे।
मोहन कुमार
35/472 नौबस्ता लोहामंडी
आगरा- 9411922603 मो.न.


